क्या आप जानते है कि अन्न-जल ग्रहण करने के पूर्व क्यों लगाना चाहिए भगवान को भोग | Why We Offer Prasada To God

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उसी जगह जब मोहन ने अपने पैसों से मिठाई खरीदी तो उस समय उसे अपने पिता की दी हुई शिक्षा का ध्यान आया कि कोई भी वस्तु अकेले नहीं खाना चाहिए | तब जब वह मिठाई लेकर पिता के पास पंहुचा तो पिता मोहन के आचरण को देख बहुत प्रसन्न हुए | उन्होंने बेटे की आज्ञाकारिता की प्रशंसा की और उसे पुरुस्कृत भी किया | परन्तु सोहन को फिजूल खर्ची के लिए डांट पड़ी और साथ-साथ उसके खर्चों पर भी कटौती कर दी गयी |

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जब घर के मुखिया द्वारा दी गयी वस्तु पुत्रों द्वारा सर्वप्रथम पिता को समर्पित करने से पिता इतना प्रसन्न होता है तो परमपिता परमेश्वर के अनुग्रह से उपलब्ध अन्न-जल सर्वप्रथम उन्हें समर्पित करने से वह क्यों न प्रसन्न होंगे |

 

मनुष्य को जो कुछ भी प्राप्त होता है उसमे देव, पितर, अतिथि सबका हिस्सा होता है | अतः उसे चाहिए कि वह उनके द्वारा प्रदान किये गए अनुग्रह को सर्वप्रथम उन्हें ही समर्पित करके स्वयं ग्रहण करे इससे प्रभु प्रसन्न होते है | परमात्मा द्वारा प्राप्त वस्तु का भोग लगाना, उनके प्रति आस्थावान होने का भाव व्यक्त करता है |

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