प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा विधि, व्रत कथा एवं महत्व और जाने किस तरह करें माँ को प्रसन्न |

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कैसे अवतरित हुई माँ शैलपुत्री ?

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एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया, किन्तु उन्होंने शंकरजी निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन व्याकुल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा कि प्रजापति दक्ष किसी कारणवश उनसे रुष्ट हैं। उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया किन्तु उन्हें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। ऐसी स्थिति में उनका वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।

शंकरजी के इस उपदेश से सती को प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने,  माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी। सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे।

परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर उन्होंने बहुत बड़ी गलती की है। वे अपने पति का अपमान सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध हो अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।

सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे ‘शैलपुत्री’ नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था। 

माता की उपासना के लिए मंत्र

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृत शेखराम ।
वृषारूढ़ा   शूलधरां  शैलपुत्री  यशस्विनीम ॥

भोग :

माँ शैलपुत्री के चरणों में गाय का घी अर्पित करने से भक्तों को आरोग्य रुपी आशीष मिलता है व उनका मन एवं शरीर दोनों ही निरोगी रहते हैं |