इस कारण भगवान गणेश बने प्रथम पूज्य और इनका वाहन हुआ मूसक |

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गणेश जी कैसे बने प्रथम पूज्य

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एक समय की बात है जब कैलाश में महादेव एवं माता पारवती वार्तालाप कर रहे थे तभी वहां पास में ही उनके दोनों पुत्र कार्तिके और गणेश खेल रहे थे | शिव एवं पार्वती उन्हें साथ में खेलता देख आनंदित हो रहे थे तभी अचानक खेलते-खेलते कार्तिके और गणेश में झगड़ा शुरू हो गया | झगड़ा यह था कि कार्तिके जी ने गणेश जी को कहा कि तुम इतने मोटे हो और तुम्हारा वाहन चूहा इतना अजीब और छोटा, यह तो तुम्हारे भार से ही दब जाता होगा | गणेश जी ने कार्तिके को प्रतिउत्तर देते हुए कहा कि भले ही मेरा वाहन छोटा है पर यह बहुत चालाक है और तुम्हारे वाहन मयूर के पैर तो देखो कैसे टेढ़े-मेढ़े है | दोनों में झगड़ा समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा था तभी दोनों ने फैसला किया कि चलो माता-पिता से ही पूछ लेते है |जब दोनों अपने माता-पिता शिव और पार्वती के पास पहुंचे और उनको सारा किस्सा बताया तो माँ पारवती ने कहा कि देखो तुम दोनों में जो भी साड़ी प्रथ्वी की सात परिक्रमा पहले करलेगा उसी को विजयी घोषित किया जाएगा |

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ऐसा सुनकर कार्तिके गर्व से सोचते हुए कि मेरा वाहन तो गणेश के वाहन से तेज है में तो इससे पहले परिक्रमा लगाकर लौट आऊंगा, अपने वाहन मयूर में बैठकर चले गए | अब भगवान गणेश कि बारी थी तो उन्होंने अपने बुद्धिबल का इस्तमाल कर वह सरोवर में नहाए और फिर आकर अपने माता-पिता कि सात परिक्रमा कर के हाथ जोड़ कर खड़े हो गए | तभी माँ पार्वती ने पूछा कि यह क्या गणेश तभी गणेश जी ने उत्तर देते हुए कहा कि मेरे माता-पिता ही मेरे लिए सब कुछ है अतः आपकी परिक्रमा प्रथ्वी की परिक्रमा करने के बराबर है | यह सुनकर भगवान शिव और पार्वती बड़े प्रसन्न हुए और जब कार्तिके लौट कर आए तो उसे सारी बात बताते हुए माँ पार्वती ने कहा कि इस प्रतियोगिता में गणेश विजयी हुआ | ऐसा सुनकर कार्तिके बहुत क्रोधित हुए और बोले कि माता आप हमदोनो में भेदभाव करती हो आपको गणेश ही अधिक प्रिय है और प्रतिज्ञा ली कि में आज के बाद कभी किसी स्त्री का मुख नहीं देखूंगा | फिर कार्तिके रूठकर क्रौन्चगिरी पर्वत कि ओर चले गए और इस तरह भगवान गणेश अपनी बुद्धिबल से प्रतियोगिता जीतकर प्रथम पूज्य होने के अधिकारी बने |

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