विदेशी वैज्ञानिक भी हो गए हैरान अपनी देसी गौ माता के इन लाभकारी गुणों को जान, क्या आप इससे परिचित है | Desi Cow Information And Benefits

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गावो विश्वस्य मातरः?

गौरक्षा, गौसेवा,गौसंवर्धन से बढ़ेगा भारत का गौरव :उमेश चन्द्र पोरवाल

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      आज विश्वभर में भारतीय देशी गौवंश के दिव्यगुणों को समझकर विश्वभर में भारतीय देशी गौवंश की मांग बढ़ रही है। जिसका दूध,दही,घी,मक्खन,छाछ,ग़ोबर,गौमूत्र जो मानव स्वास्थ्य और कृषि दोनों के लिये सर्वाधिक उपयोगी है ऐसे दिव्य गुणों की खान सिर्फ और सिर्फ भारतीय देशी गौवंश में ही विधमान है।उसकी गुणवत्ता बढ़ाई जाये । जो भारतदेश की युवा पीढ़ी देशी भारतीय गौवंश तथा पञ्चगव्य के गुणों से जो अनभिज्ञ है।

       वहीं देश के कुछ विशेषज्ञो(वैज्ञानिकों)ने कुछ माह पूर्व कहा था कि भारतीय देशी गौवंश के गौमूत्र में भी स्वर्ण सोना है।यह समाचार आने के बाद विश्वभर में हलचल मच गई।लेकिन भारत सरकार का ध्यान इस और नही जा रहा है। भारत सरकार ध्दारा भैंस, बकरी व् अन्य पशुओं पर शोध के लिये राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों की तो स्थापना की गई है।

    किंतु जहाँ भारतीय देशी गौवंश जो दिव्यगुणों की खान से परिपूर्ण है।जिसके गौमूत्र अर्क एवं गौमूत्र नीम पत्ती, लहसुन,का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पांच पेटेन्ट प्राप्त हुये 2002 से 2010 तक जो मानव स्वास्थ्य और कृषि के लिये है यह पेटेन्ट विश्व हिन्दू परिषद ध्दारा संचालित गौ विज्ञानं अनुसंधान केंद्र देवलापार जिला नागपुर महाराष्ट्र को प्राप्त हुए ।जिसमे तीन पेटेन्ट मानव स्वास्थ्य और दो पेटेन्ट कृषि स्वास्थ्य के लिये फसलरक्षक के रूप में प्राप्त हुए । प्राप्त पेटेन्ट नम्बर

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1-usपेटेन्ट न.6410059 दिनांक 25 जून 2002 सीमैप ध्दारा

2-us पेटेन्ट 6896907 दिनांक 24 मई2005 नीरी ध्दारा

3-usपेटेन्ट न. 7235262 दिनांक 26 जून 2007 सीमैप ध्दारा

4- चाईना पेटेन्ट न.100475221 दिनांक 8 अप्रैल2009

5-us पेटेन्ट न.9918360 दिनांक 5 मई2010?

       जहाँ पांच पांच पेटेन्ट देशी गौवंश के गौमूत्रपर प्राप्त हुये जो मानव और कृषि दोनों के लिये अनन्त उपयोगी है।फिर भी भारत सरकार का ध्यान इन 7 सालों से अभी तक नही जा रहा है। आज जहाँ सारे भारत और विश्वमें भी गौविज्ञान अनुसंधान केन्द्र देवलापार नागपुर महाराष्ट्र से गौमूत्र अर्क एवं गौउत्पाद की मांग पर पहुँच रहे है।जो मानव स्वास्थ्य के असाध्य रोगों के परिणाम में सफलता भी प्राप्त हो रही है और वहीं गौवंशाधारित रसायनमुक्त खेती में भी सफलता प्राप्त हो रही है।जो कम लागत में अधिक और अच्छा उत्पादन दे रही है।

   गौविज्ञान अनुसंधान केंन्द्र देवलापार नागपुर में ऐसी कार्यशालाओ का आयोजन भी होता रहता है।

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देशभर में जो आयुर्वेदिक वैध गौमूत्र पञ्चगव्य पर कार्य कर रहे है उनकी कार्यशाला साल दो साल में होती रहती है।  एवं देशभर से किसानों का प्रशिक्षण प्रतिमाह पांच दिवसीय रहता है जहाँ उनको गौवंशाधारित खेती और गौउत्पाद की पूरी जानकारी विशेषज्ञयो ध्दार दी जाती है।जहाँ से लोग सीखकर अपने अपने राज्यो में रसायनमुक्त  गौवंशाधारित खेती करते है। ऐसे लगभग 60 से 70 हजार किसानों  प्रशिक्षित होकर गये है।

          ऐसे अति महत्वपूर्ण कार्य को भारत सरकार शीघ्र ध्यान देकर मानव स्वास्थ्य और आरोग्य,समृध्दि स्वावलम्बी सर्वहित कारी गौवंशाधारित कृषि जो रोजगार स्वस्थ एवं सम्पन्नता के जीवन का जीवन आधार है।

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          जिसके दूध के गुणों की दिव्यता को समझकर अमेरिका के चिकित्सा वैज्ञानिक डॉ.थॉमस कावेन(एम डी)ने विश्व प्रसिध्द पुस्तक द डेविल इन द मिल्क की भूमिका में लिखा है। पुस्तक के लेखक डॉ.के.बी.वुडफोर्ड है जो वर्तमान में लिंकन विश्व विद्यालय न्यूजीलैंड में एग्रिविजनेश एन्ड फार्म मैनेजमेन्ट के प्रोफेसर है। उन्होंने डेयरी और चिकित्सा जगत में भूचाल लाने वाले सौ से ज्यादा विश्वस्तरीय शोध अध्ययनों पर आधारित यह शोध प्रवन्ध अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ।जिससे यह प्रमाणित हुआ है कि सयुक्तराष्ट्र अमेरिका,उत्तरियूरोप ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड में अधिकांश पाई जाने वाली गायों के दूध में बीटा कैसीन ए-1 नामक प्रोटीन पाया जाता है जो मानव स्वास्थ्य के लिये असुरक्षित है।और भारतीय देशी गाय के दूध में बीटा कैसीन ए-2नामक प्रोटीन पाया जाता जो मानव स्वास्थ्य के लिये पूर्णता सुरक्षित है।

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           शोध अध्ययनों से जुड़े सभी चिकित्सा वैज्ञानिकों ने इस बात पर सहमत हुये की मानव स्वास्थ्य के लिये बीटा कैसीन ए-2मिल्क ही उपयोग्य में लिया जाये। लेकिन इसकी उपलब्धता के लिये डॉ. कीथ कहते है कि ए-2 मिल्क की गायों का आयात करना एक उपाय है।

दूसरा उपाय है पशिचम की सारी गायों का जेनेटिक टेस्ट करके ए-2मिल्क की गायों को अलग करना।

तीसरा उपाय है ए-2मिल्क के सांड के माध्यम से पशिचम की गायों का नस्ल सवंर्धन करके ए-2मिल्क गायों में परिवर्तन करना।

   आज अमेरिका,न्यूजीलैंड तथा आस्ट्रेलिया की अनेक कम्पनिया जेनेटिकली टेस्टेड ए-2गायों का दूध बाजार में उपलब्ध करवा रही है और मानव स्वास्थ्य के लिये सुरक्षित दूध के नाम पर विज्ञापन कर रही है।

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        हम भारतीय बहुत सौभाग्यशाली है कि भारत देश की सभी देशी गाये ए-२मिल्क उत्पादन करती है। इतिहास साक्षी है 1960के दशकमे ब्राजील भारत से गिर,कांकरेज नस्लकी गायों को ले गया था।वहाँ दूध उत्पाद में बहुत ही उत्तम निकली और 2010 वहाँ दुग्धउत्पादन में प्रतियोगिता हुई ।उसमें प्रथम,ध्दतीय,तृतीय पुरस्कार में प्रतिदिन 45,42,लीटर दूध देकर गिर और कांकरेज भारतीय गायों ने पुरस्कार प्राप्त किया।

अगर भारत देश के नीति निर्माता योजनाकारों,और राजनेताओं ने भारतीय देशी नस्ल की गायों पर ध्यान दिया होता तो आज विश्व में भारत दुग्धउत्पादन में पहले नम्बर पर होता ।हमारे यहाँ कहावत रही है पानी मांगो दूध मिलता था।यहाँ दूध दही की नदियॉ बहती थी ऐसी कहाबत है।लेकिन आज भारत मॉस निर्यात प्रमुख  देशों में गिना जाता है।

          इसके प्रमुख दोषी हम सब हिन्दू समाज के लोग ही है।एक तरफ गौमाता कहते है।और जब दूध देना बन्द कर देती है।तो उसको कसाई को बेच देते है कुछ रुपये के लालच में या खोला छोड़ देते है।? पुज्य देवरहा बाबा ने कहा था कि जब तक पवित्र भारत भूमि में गौरक्त गिरता रहेगा तब तक कोई भी धार्मिक कार्य,सामाजिक,राजनैतिक कार्य सफल नही होंगे सबको इस गऊमाता के पवित्र कार्य में लगकर,गौसेवा,गौरक्षा, गौसंवर्धन के कार्य में लग जाना चाहिये तब ही भारत देश का गौरव गौरक्षा, गौसेवा से बढ़ेगा।

?छत्तीसगढ़ में कामधेनु विश्वविद्यालय बना है।नाम कामधेनु है और काम अन्य पशुओं पर हो रहा है। जो बहुत बड़ा दुर्भाग्य है जहाँ भारत सरकार ने छत्तीसगढ़ की गाय को कोसली नस्ल नाम दिया है।

जो छत्तीसगढ़ राज्य के लिये गौरवान्ति होने का विषय है।

          राज्य के प्रत्येक जिला केन्द्रों में कोश्ली नस्ल की 50-50गायों को रखकर उन पर शोध कर गौदुग्ध उत्पादन को बढ़ाना और अनेक गौउत्पादन निर्माण करने ग्रामीण कृषकों को अपनी देशी गाय के दूध,दही,घी,ग़ोबर,गोमूत्र पञ्चगव्य से बनने वाले मानव स्वास्थ्य और कृषि दोनों में होने वाले लाभ की जानकारी मिलती । जिसप्रकार से इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय की इकाई प्रत्येक जिला में है जहाँ शोध,शिक्षा,प्रचार-प्रसार तीनो पर कार्य हो रहा है जिससे आज छत्तीसगढ़ कृषि के क्षेत्र में प्रगतिशील हो रहा है।

      आज गोचर ,चारागाह खत्म हो गये है कब्जे हो गये है।  जिसके कारण पौष्टिक चारा और उन्नत सांड तैयार करने की प्रक्रिया लगभग समाप्त सी हो गई है ।इस पर कामधेनु विश्वविद्यालय को काम करना है।गौसंवर्धन, नस्ल सुधार, और गौउत्पादों पर।

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            यूनेस्को की वलर्ड चिल्ड्रन स्टेट्स रिपोर्ट 2008 में खुलासा किया था कि भारत में प्रतिदिन 5000 बच्चे चार वर्ष की आयु पूरा होने तक ही कुपोषण व् बीमारी के शिकार होकर मर रहे है।  केन्द्र सरकार ने नेशनल पोल्ट्री नेशनल फिशर एण्ड मीट डैवलपमेंट बोर्ड की स्थापना की है माँस पशु पक्षियों की हत्या से तैयार होता है उसके भक्षण से तामसिक ऊर्जा निर्माण होती है।जिससे अपराध की प्रव्रन्ति बढ़ती है।जबकि  भारतीय देशी गौवंश के दूध से सात्विक ऊर्जा प्राप्त होती है।गाय का दुग्धोत्पादन बढ़ाने के विकास की आवश्यकता है ।उसके दिव्य गुणों की खान भारतीय गौवंश में है।? केंद्रसरकार और राज्य सरकारे भारतीय देशी गौवंश अनुसंधान केन्द्र स्थापित करे।जिससे ऋषि-कृषि प्रदान भारत देश के ऋषि मुनियों ने जीवन का सम्रग चिन्तन करते हुये -गौविज्ञान का अविष्कार किया |

भारतीय गौवंश कृषि का आधार है |

भारतीय गौवंश स्वास्थ्य का आधार है |

भारतीय गौवंश आयुर्वेद का आधार है |

भारतीय गौवंश अर्थव्यवस्था का आधार है |

भारतीय गौवंश ज्ञान और जीवन का आधार है |

भारतीय गौवंश वैतरणी पार कराने का आधार है।

 गौ शब्द से गौरव शब्द बना है भारत देश का गौरव गौसेवा,गौरक्षा, गौसंवर्धन होगा तब ही बढ़ेगा।

भारत सरकार सम्पूर्ण गौवंश हत्या बन्दी का केंद्रीय कानून बनाये।गौअनुसन्धान संस्थान स्थापित करें।गौ मंत्रालय बनाये।                                            ? जय गौमाता जय ग़ोपाल |

आप सब से अनुरोध है कि अपने देश को स्वस्थ, स्वावलंबी एवं समृद्ध बनाने के लिए इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शेयर करें और एक आदर्श नागरिक होने का कर्तव्य निभाएं |

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