Ahoi Ashtami – संतान की मंगल कामना हेतु करें अहोई अष्टमी का व्रत

0
1255

अहोई अष्टमी व्रत कथा 

बहुत समय पहले की बात है | एक साहूकार के सात बेटे और सात बहुएँ थीं | इस साहूकार की एक बेटी भी थी जो दीपावली में ससुराल से मायके आई थी । दिवाली का त्यौहार नजदीक ही था | घर की साफ़-सफाई पूरी करनी थी, रंग रोंगन करना था | दीपावली पर घर को लीपने के लिए सातों बहुएँ मिट्टी लाने जंगल में गई तो ननद भी उनके साथ हो ली | जहाँ साहुकार की बेटी मिट्टी खोद रही थी उस स्थान पर स्याही (साही) अपने सात बेटों के साथ रहती थी। मिट्टी खोदते हुए ग़लती से साहूकार की बेटी की खुरपी के चोट से स्याही का एक बच्चा मर गया | इस पर स्याही ने क्रोधित होकर साहूकार के पूरे परिवार को श्राप दिया कि अब वह भी संतान के शोक में तड़पेगा | जिसके बाद से साहूकार के परिवार में नाती-पोतों की मौत होने लगी और माताएँ बेचैन होने लगीं |  साहूकार की सातों बहुएँ एवम पुत्री इस समस्या के हल के लिए मंदिर गयीं और वहाँ देवी के सामने विलाप करते हुए अपनी सारी पीड़ा बताने लगीं | तभी वहाँ एक महात्मा आये जिन्होंने उन सभी को अहोई अष्टमी का व्रत करने को कहा | महात्मा के मुख से अहोई अष्टमी के बारे में सुनकर उन सभी ने पूरी श्रद्धा के साथ अहोई अष्टमी का व्रत किया, जिससे स्याही का क्रोध शांत हुआ और उसके प्रसन्न होते ही उसने अपने श्राप को निष्फल कर दिया |  इस तरह आठों स्त्रियों की संतानें जीवित हो गयीं | अहोई व्रत का महात्मय जान लेने के बाद आइये अब जानें कि यह व्रत किस प्रकार किया जाता है।

अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त

पूजा का समय                     17:50 से 19:06

अष्टमी तिथि शुरू होगी           12 अक्टूबर दोपहर 6:55

अष्टमी तिथि ख़त्म होगी         13 अक्टूबर 4:59

अहोई अष्टमी के दिन चंद्रोदय    23:53 बजे

अहोई अष्टमी-व्रत पूजन विधि

ahoi astami puja vidhi in hindiअष्टमी के दिन सुबह उठकर स्नान कर, यह व्रत निर्जला किया जाता है | इस दिन सबसे पहले जमीन पर गोबर से लीपकर चौक बनाया जाता है | इस पर चौकी को रख उस पर कलश की स्थापना होती है । गणेश जी की स्थापना की जाती है और उसके बाद अहोई माता एवम साही का चित्र रखा जाता है | फिर अहोई अष्टमी माता के चित्र की विधि विधान से पूजा कर, उन्हें दूध-चावल का भोग लगाया जाता है | तत्पश्चात एक पाटे पर जल से भरा लोटा रखकर  व्रत-कथा सुनी जाती है | अहोई अष्टमी की पूजा सायंकाल को तारों के निकलने पर की जाती है | पूजा के बाद कुछ मातायें जल एवं फलाहार ग्रहण करती हैं | इस दिन कईं सम्पन्न घर की स्त्रियाँ चाँदी की अहोई माता बनवाती हैं और पूजा के बाद इन्हें माला में पिरो कर धारण करती हैं | इस माला को दिवाली के बाद उतारा जाता हैं और बड़ो का आशीष लिया जाता है | कहते हैं अहोई अष्टमी माता बच्चों को सुरक्षा प्रदान करती हैं और हमेशा उनके साथ होती हैं इसलिए माताएं इनकी पूजा करती हैं | उत्तर भारत में इस व्रत को एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है |

अपना मूल्यवान समय देने के लिए धन्यवाद और अगर आपको हमारा यह पोस्ट अच्छा लगा हो तो कृपया अपने प्रियजनों के साथ शेयर करें |