अघोरियों से जुड़ी ये 10 बातें आपके होश उड़ा देंगी|10 Unbelievable Facts of Aghori

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आपने कुम्भ के मेले में या समशान में साधुओ को तपश्या करते हुए देखा होगा। कई बार तो इनके लम्बे बाल या इनके पहनावे को देख कर लोग डॉ जाते है, इन्हें अघोरी (Aghori) कहते है ।अघोरी का नाम सुनते ही कुछ लोगों के मन में डर बैठ जाता है। परन्तु अघोरी इतने डरावने केवल दिखने में ही होते है वास्तव में ये बहुत सरल होते है।इनके बारे में कई ऐसी बाते है जो आम लोग नही जानते।आज हम उन्ही कुछ बातों के बारे में जानेंगे।

कोन होते है अघोरी (Who Is Aghori) ?

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अघोरी को कुछ लोग अघोड़ भी कहते है।अघोरी का अर्थ होता हैं अ+घोर यानी जो घोर नही होते,जो सीधे या सरल होते है,जिनके अंदर कोई भेद भाव की भावना नही होती।कहते है की अघोरी बनना बहुत मुशिकल होता है या हम ये भी कह सकते है की सरल बनना बहुत मुश्किल होता है।सरल बनने के लिए अघोरी बड़ा कठिन रास्ता अपनाते है।अघोरी लोग साधना करते है और जब उनकी साधना पूर्ण जाती है तो उसके बाद अघोरी हमेंशा के लिए हिमालय चले जाते है।

अघोर पंथ की उत्पत्ति और इतिहास (History of Aghori)

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अघोर पंथ के प्रणेता भगवान शिव माने जाते हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव ने स्वयं अघोर पंथ को प्रतिपादित किया था। अवधूत भगवान दत्तात्रेय को भी अघोरशास्त्र का गुरु माना जाता है। अवधूत दत्तात्रेय को भगवान शिव का अवतार भी मानते हैं। अघोर संप्रदाय के विश्वासों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीनों के अंश और स्थूल रूप में दत्तात्रेय जी ने अवतार लिया था। अघोर संप्रदाय के एक संत के रूप में बाबा कीनाराम की पूजा होती है। अघोर संप्रदाय के व्यक्ति शिव जी के अनुयायी होते हैं। इनके अनुसार शिव स्वयं में संपूर्ण हैं और जड़, चेतन समस्त रूपों में विद्यमान हैं। इस शरीर और मन को साध कर और जड़-चेतन एवं सभी स्थितियों का अनुभव कर के और इन्हें जान कर मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है।

प्रमुख अघोर स्थान|Most Famous Places For Aghori Sadhna

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वाराणसी या काशी को भारत के सबसे प्रमुख अघोर स्थान के तौर पर माना जाता हैं। भगवान शिव की स्वयं की नगरी होने के कारण यहां विभिन्न अघोर साधकों ने तपस्या भी की है। यहां बाबा कीनाराम का स्थल है जिसे एक महत्वपूर्ण तीर्थ भी माना जाता है। काशी के अतिरिक्त अघोर साधकों के लिए गुजरात के जूनागढ़ का गिरनार पर्वत भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। जूनागढ़ को अवधूत भगवान दत्तात्रेय के तपस्या स्थल के रूप में भी जाना जाता है।

क्या आप जानते है की अघोरी समशान में क्यों जाते है,मुर्दे के मांस व कफ़न आदि को क्यों अपनाते है ?

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ऐसा इसलिए क्योंकि जिनसे लोग घृणा करते है अघोरी उन्हें अपनाते है।लोग समशान ,लाश ,मुर्दे का मांस व कफ़न आदि से घृणा करते है लेकिन अघोरी इन्हें अपनाते है।अघोरी विद्या व्यक्ति को ऐसा बनाती है  जिनमे वे अपने व पराये को भूल कर सब को एक समान मानने लगते है।उनके मन में कोई भेद भाव नही होता औरउनके लिए सब एक सामान होते है।

अघोर विद्या सबसे कठिन होती है लेकिन तत्काल फलित होती है।साधना करने से पहले उन्हें मोह माया का त्याग करना पड़ता है।हम अघोरी उन्हें भी कहते है जिनके भीतर से अच्छे-बुरे, सुगंध-दुर्गन्ध,प्रेम-नफरत, ईर्षा-मोह जैसे सरे  भाव मिट जाते  है।

अघोरी बनना बहुत मुशिकल इसलिए भी है क्योंकि वे लोग खाने के बारे  में भी इतना नही सोचते ,उन्हें रोटी मिले तो रोटी खा लेते है ,खीर मिले तो खीर,बकरा मिले मिले तो बकरा,और यदि मानव शव मिले तो उससे भी परहेज नही करते है। अघोरी लोग सड़ते पशु का मांस भी बिना हिचकिचाहट के खा लेते है परंतु अघोरी गऊ माता का मांस कभी नहीं खाते।

क्या आप जानते है कि अघोरी समशान में क्यों रहते है (Why Aghori Lives Samshanghat)?

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एसा इसलिए क्योंकि वे समशान में अपनी साधना करते है जिसका एक विशेष महत्व है।वह यह है की अघोरी जानना चाहते है की मौत और वैराग्य क्या होता है। व्यक्ति के मरने के बाद आत्मा कहाँ चली जाती है ? क्या आत्मा से बात की जा सकती है ? ऐसे बहुत सरे कारण है जिनकी वजह से अघोरी समशान में रहना पसन्द करते है। उनके अनुसार समशान में साधना करना फलदायक होता है।और वे समशान में साधना इसलिए भी करते है क्योंकि वहाँ साधारण मनुष्य जाना पसन्द नही करता जिससे उनकी साधना में कोई विघ्न भी नही पड़ता है।

अघोरी का मन्ना है की समशान में शिव जी का वास होता है और उनकी उपासना हमे मोक्ष की ओर ले जाती है। किन्तु जो लोग दुनियादारी और गलत कामों के लिए तंत्र साधना करते है उनका अंत बहुत ही बुरा होता है।

अघोरी समशान में कौन सी साधना करते है (Types of Aghori Sadhna’s)?

ये समशान में तीन तरह की साधना करते है – समशान साधना, शव साधना और शिव साधना।

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  • शव साधना में मुर्दा जिन्दा हो कर बोलने लगता है और आपकी इच्छा पूरी हो जाती है।
  • शिव साधना में शव के ऊपर पैर रख कर खड़े रहकर साधना करते है। बाकि साधना शव साधना की तरह ही होती है। ऎसी साधना में मुर्दे को प्रशाद के रूप में मांस और मदिरा चढ़ाया जाता है।
  • अब तीसरी साधना जो की समशान साधना होती है इसमें आम परिवारजनों को भी शामिल किया जा सकता है। इस साधना में मुर्दे की जगह एक विशेष पूजा की जाती है जिसमे प्रशाद के रूप में मांस मदिरा की जगह मावा चढ़ाया जाता है।

भूत पिशाचों से बचने के लिए क्या करते है अघोरी (How Aghori Saves Himself From Evils)?

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भूत पिशाचों से बचने के लिए अघोरियों के पास खास मन्त्र होते है। साधना करने के बाद अघोरी धूप लगा कर दीपदान करते है और फिर उस मंत्र का जाप करते हैं, इसके बाद चिता के चरों ओर लकीर खींच देते हैं। फिर तुतई बजाना शुरू करते है और साधना शुरू हो जाती है । ऐसा करके अघोरी अन्य प्रेत पिसाचों को चिता की आत्मा और खुद को अपनी साधना में विघ्न डालने से रोकता है।

क्या आप जानते है की अघोरी जिद्दी और गुस्सेल क्यों होते है (Why Aghori Always Looks In An Anger Mood)?

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ऐसा कहा जाता है की अघोरी जो मांगते है वो लेके ही जाते है। यदि वे क्रोधित हो जाते है तो तांडव करने लगते है या बुरा भला कहकर श्राप देने लगते है। एक अघोरी की आँखे लाल होती है लेकिन अघोरी की आँखों में जितना क्रोध दिखाई देता है बातों में उतनी ही शीतलता होती है।

अघोरी की वेशभूषा क्या होती है ?

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कफ़न के काले वस्त्रों  में लिपटे अघोरी बाबा के गले में धातु की बनी नरमुंड की माला लटकी होती है। नरमुंड न हो तो वे प्रतीक रूप में उसी तरह की माला पहनते है। हाथ में चिमटा, कमण्डल, कान में कुंडल ,कमर में कमरबन्ध और पूरे शरीर पर राख मलकर रहते है। ये साधु अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते है |

अघोर बनने के लिए क्या करना पड़ता है ?

जो लोग अपने को ‘अघोरी’ व ‘औगढ़’ बतलाकर इस पंथ से अपना संबंध जोड़ते हैं उनमें अधिकतर शवसाधना करना, मुर्दे का मांस खाना, उसकी खोपड़ी में मदिरा पान करना तथा घिनौनी वस्तुओं का व्यवहार करना भी दिखाई पड़ता है जो कदाचित् कापालिकों का प्रभाव है। इनके मदिरा आदि सेवन का संबंध गुरु दत्तात्रेय के साथ भी जोड़ा जाता है, जिनका मदकलश के साथ उत्पन्न होना भी कहा गया है। अघोरी कुछ बातों में उन जोगी औघड़ों से भी मिलते-जुलते हैं जो नाथपंथ के प्रारंभिक साधकों में गिने जाते हैं और जिनका अघोर पंथ के साथ कोई भी संबंध नहीं है। इनमें निर्वाणी और गृहस्थ दोनों ही होते हैं और इनकी वेशभूषा में भी सादे अथवा रंगीन कपड़े होने का कोई कड़ा नियम नहीं है। अघोरियों के सिर पर जटा, गले में स्फटिक की माला तथा कमर में घाँघरा और हाथ में त्रिशूल रहता है जिससे दर्शकों को भय लगता है।

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