क्या होता है कुण्डलिनी जागरण ? और अगर ये कुण्डलिनी चक्र जाग्रत होजाएं तो ?

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कुण्डलिनी शक्ति

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अर्वाचीन तन्त्रग्रंन्थों के अनुसार मानव शारीर की दिव्य शक्ति जो की मूलाधार चक्र में विधमान है उसे कुण्डलिनी शक्ति कहते है एवं वैदिक साहित्य में इसे  ब्रहावार्चस कहा जाता है | वैसे तो प्राण शक्ति इड़ा एवं पिंगला से ही प्रवाहित होती है | जब व्यक्ति नियमित रूप से संयमपूर्वक प्राणायाम एवं यौगिक क्रियाओं का अभ्यास करता है, तब अदभुद शक्ति जो कि सुप्त सुषुम्ना नाड़ी में विधमान है वह विकसित होने लगती है | जिन शक्तियों का उपयोग भोगो में हो रहा था वे सभी शक्तियां प्राणायाम के अभ्यास से जाग्रत होकर ऊपर की ओर उठने लगती है | कई महा ज्ञानी जैसे अफलातून और पाइथागोरस ने भी अपनेलेखों में उल्लेख किया है की नाभि के पास एक ऐसी शक्ति विधमान है जो कि बुद्धि के प्रकाश को उज्जवल कर देती है, जिससे मनुष्य के अन्दर दिव्य शक्तियां जाग्रत होने लगती है |

कुण्डलिनी जागरण

शास्त्रों में कहा गया है कि जो शक्ति इस ब्रहमांड में है वही शक्तियां इस पिंड में भी है | सारी शक्ति का श्रोत मूलाधार चक्र ही है | मूलाधार चक्र के जाग्रत होने पर आलौकिक शक्तियां ऊपर की ओर उठने लगती है और इसे ही कुण्डलिनी जागरण कहते है | उधारण के तौर पे जैसे सोचें कि विधुत के तार बिछाए हुए हों तथा बल्ब आदि भी लगाय हुए हों, उनका नियंत्रण मेन स्विच से जुड़ा होता है | जब मुख्या स्विच को आँन कर देते है, तब सभी यंत्रो में विधुत प्रवाह होने के कारण रोशनी होने लगती है | इसी प्रकार मूलाधार में विधमान दिव्य विधुतीय शक्ति जाग्रत होने पर अन्य चक्रों का भी जागरण स्वतः होने लगता है |

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कुण्डलिनी शक्ति जैसे-जैसे मूलाधार चक्र से जाग्रत होकर अन्य चक्रों की तरफ ऊपर की ओर उठती है, तो इसके संपर्क में आते ही अन्य चक्र भी ऊर्ध्वमुखी हो जाते है | जब यह शक्ति आज्ञा-चक्र में पहुँचती है तो सम्प्रज्ञात समाधि तथा जब सहस्त्रार चक्र में पहुंचती है, तब समस्त व्रतियों के निरोध होने पर असम्प्रज्ञात समाधि होती है | इसी अवस्था में चित्त में निहित दिव्य ज्ञानलोक भी प्रगट होने लगता है जिसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते है | इस ऋतम्भरा प्रज्ञा की प्राप्ति होने पर साधक को पूर्ण सत्य का बोध हो जाता है और अंत में इसके बाद साधक को निर्बीज समाधि का असीम, अनंत, आनंद प्राप्त हो जाता है | यही योग की चरम अवस्था है | इस अवस्था में पहुंचकर संस्कार-रूप में विधमान वासनाओं का भी नाश हो जाने से जन्म एवं मरण के बन्धन से मुक्त हो कर परमानंद को प्राप्त कर लेता है |