क्या स्वर्ण, मदिरालय एवं वैश्यालय में कलयुग का निवास है ?

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एक पौराणिक आख्यान के अनुसार जब कलयुग का आगमन काल आया तो कलयुग के विकराल और भैयानक रूप को देखकर पृथ्वी गौ का रूप धारण कर भाग कड़ी हुई और भैयानक रूप धारण किया हुआ कलयुग उसका पीछा करने लगा | डर से थरथर कांपती हुई पृथ्वी जो की गौ रूप में थी पहले ब्र्म्हलोक में गयी और ब्र्हम्हा जी से अपनी रक्षा की पुकार करने लगी, तब ब्र्हम्हा जी ने कहा हे पृथ्वी ! हम कलयुग से तुम्हारी रक्षा करने में असमर्थ है क्योंकि कलयुग का समय आ चुका है और अपने काल में हर कोई बलवान होता है अतः तुम अपनी रक्षा के लिए शिव जी के पास जाओ | ब्रम्ह्लोक से निराश होकर पृथ्वी ने फिर शिवलोक की ओर प्रस्थान किया और शिव जी से अपनी रक्षा की पुकार की | शिव जी ने अपनी दिव्य द्रष्टि से कलयुग को मुंह फैलाय हुए आता देखा और ये भी देखा की कलयुग का शासनकाल आ चुका है, तब उन्होंने गौ रुपी पृथ्वी से कहा-हम तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते अतः तुम भगवान् श्री हरि विष्णु की शरण में जाओ | तब पृथ्वी बैकुंठ लोक जाकर भगवान् विष्णु को अपनी कथा व्यथा बताई | भगवान विष्णु ने भी पृथ्वी से यही कहा कि हे वसुन्धरे हम भी तुम्हारी रक्षा करने में असमर्थ है | यह सुनकर पृथ्वी घबरा गयी तब विष्णु जी ने पुनः बोला कि तुम निराश नयी हो | तुम्हारे ही लोक में एक धर्मात्मा राजा परीक्षित राज्य करते है | उनके डर से कलयुग उनके राज्य में प्रवेश नहीं कर सकेगा | तुम उन्ही की शरण में जाओ | तब हांफती-कांपती पृथ्वी बैकुंठ लोक से भागती हुई पृथ्वी राजा परीक्षित के पास गयी और उनके पैरो के पास बैठकर बोलने लगी | हे राजन ! मेरी रक्षा करो | मै आपकी शरण में हूँ | उसी समय कलयुग अपना मुंह फैलाये हुए आया और कहने लगा-यह मेरा शिकार है, तुम मेरे शिकार को मेरे हवाले करदो |

उस समय राजा परीक्षित ने क्रोधित होकर अपना धनुष बाण उठा लिया और बोले- अरे दुष्ट ! यह गौ मेरी शरण में है और शरणागत की रक्षा करना प्रत्येक राजा का धर्म है | तू ठहर ! अभी में तुझे मृत्यु के मुंह में डालता हूँ | धर्मनिष्ठ राजा परीक्षित के वचनों को सुनकर कलयुग घबरा गया किन्तु फिर साहस कर के बोला-राजा ! मेरा शिकार मुझे सौप दो अन्यथा में तुम्हे भी मार डालूँगा | कलयुग की वाणी सुनकर राजा परीक्षित क्रोधित हो उठे और तुरंत अपना धनुष एवं बाण उठा कर उसे मारने को तत्पर तैयार होगये | कलयुग भी लड़ने को तैयार हो गया | लड़ाई आरम्भ होगयी और कई दिनों तक चलती रही | राजा परीक्षित अपने सत्य एवं धर्मं के बल पर निरंतर लड़ते रहे तब कलयुग ने विचार किया कि इनको युद्ध में पराजय करना बिलकुल असंभव है तब उसने छल का सहारा लिया और उन्ही राजा परीक्षित की शरण में जा गिरा और कहने लगा – हे राजन ! मै भी आपकी शरण में हूँ | जिस प्रकार आपने अपनी शरण में आयी गौ की रक्षा की उसी प्रकार हमारी भी रक्षा करो | यदि आप हमारी रक्षा नहीं करेंगे तो आपको पाप लगेगा | तब राजा परीक्षित ने कहा-ठीक है मै तुम्हे अभयदान देता हूँ | उस समय कलयुग ने कहा मेरे लिए भोजन और निवास की व्यवस्था करना आपका धर्म है | आप मुझे ‘भण्डार’ (अन्न आदि जहां रखे जाते है) में रहने का स्थान दे दें | वहा मेरे लिए भोजन भी मिल जाएगा और निवास भी हो जायेगा | तभी राजा परीक्षित ने विचार किया की ये कलयुग पापी स्वभाव का है अगर इसे भण्डार में रहने देदिया तो ये वहा पर भोजन में विष मिला सकता है | यदि इसने विष मिला दिया तो मेरी सारी प्रजा मर जायगी |

राजा परीक्षित ने कहा नहीं कलयुग ! मै तुम्हे भण्डार में स्थान नहीं दे सकता | मै अपने हिसाब से तुम्हारे रहने की व्यवस्था करूँगा | राजा ने कहा कि तुम वैश्यालय या मदिरालय में सुख पूर्वक रह सकते हो | कलयुग ने कहा ठीक है | यह कहकर वेह मदिरालय एवं वैश्यालय में चला गया किन्तु धर्मात्मा परीक्षित के राज्य में मदिरा पीने वाले और वैश्यालय करने वाले नहीं थे जिस कारण कलयुग पुनः राजा के सामने उपस्थित होकर कहने लगा हे महाराज | इतनी छोटी जगह मेरे लिए बहुत कम है अतः कोई और भी जगह दे दो | अगर आप कहें तो स्वर्ण (सोने) में रहूँ | तब राजा ने अपने मन में विचार किया की स्वर्ण तो बहुत थोडा ही होता है अगर यह स्वर्ण में रहेगा तोभी कोई बात नहीं | यह सोचकर उन्होंने कलयुग को सोने में रहने का आदेश देदिया |

आदेश पाते ही कलयुग राजा परीक्षित के राजमुकुट में समां गया जो सोने का बना हुआ था | मुकुट में समाते ही उसने राजा की बुद्धि उलट दी | फिर क्या था, फिर क्या था जिसे सजा देना चाहिये उसे राजा ने छोड़ देने का हुक्म दे दिया और जो बेकुसूर थे उसे सजा सुना दिये | इस प्रकार राज्य में सारे कामकाज उलटे होने लगे | जब वे निद्रा के लिये जाते थे तब वेह मुकुट उतार देते थे और तब कलयुग का प्रभाव हट जाता था और बुद्धि सही होजाती थी और ज्यों ही राजा मुकुट पेहेनते थे तो बुद्धि उलट जाती थी, कलयुग प्रभावी हो जाता था |

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कलयुग के ही प्रभाव से राजा ने ताप कर रहे ऋषि के गले में मरा हुआ सर्प दाल दिया था तथा पिता के गले में सर्प देखकर उसी ऋषि के पुत्र ने राजा को श्राप देदिया कि जिसने भी मेरे पिता के गले में मारा हुआ सर्प डाला है उसे आज से ठीक साथ दिन बाद तक्षक सांप काट लेगा और उसकी मृत्यु हो जायेगी | यह सब कुछ कलयुग के प्रभाव के कारण हुआ और आज आप देख भी रहे है कि वैश्यालय, जुआघर और शराब खाने की स्थति पूरी तरह कलयुग के प्रभाव में है | शराब पीकर लोग अनायास ही लोगो को गाली देते है, मारपीट करते है | वैश्यालय में जाने वाले अपना धन तो बर्बाद करते ही है साथ ही साथ अपने स्वास्थ्य का भी नाश करते है | अनेक प्रकार के रोगों को अपने साथ ले आते है और अपने पूरे परिवार को रोगी बना देते है | जुआघर में ढेर साड़ी दौलत कमाने के चक्कर में ग अपनी पसीने की कमाई भी गवा के चले आते है | यह कलयुग का प्रभाव नहीं तो और क्या है ? इस तरह कलयुग का प्रभाव हर वास्तु चाहे वे जीवित हो या मृत सब पर व्याप्त है |